थम जाइए, कोर्ट ने याचिकाएं स्वीकार कर ली है
 डॉ संतोष मानव

1. आज की खबर है- सुप्रीम कोर्ट ने UGC अधिनियम के खिलाफ तमाम PIL स्वीकार कर ली है. सुनवाई होगी. जजमेंट आएगा. ईश्वर के बाद कोर्ट की सत्ता है. पंच परमेश्वर होते हैं. जो फैसला आए, सब स्वीकार करें. 

2. जब कोई निर्णय हमें नापसंद हो, तो क्रोध स्वाभाविक है. पर क्रोध पर नियंत्रण भी आवश्यक है. अत्यधिक क्रोध नुकसान करता है, व्यक्ति, समूह, राज्य और राष्ट्र का. 

3. UGC अधिनियम सही है, गलत है, फैसला कोर्ट को करने दीजिए. यह उनका काम है. अपना नहीं. जबरदस्ती ज्ञानी बनना निर्रथक है. 

4. हां, यह सही है कि दोषी व्यक्ति विशेष हो सकता है, कोई समूह हो सकता है, जाति-धर्म के अधिसंख्य हो सकते हैं, पर पूरी जाति या धर्म नहीं होता. 

5. राजनीति या राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति के साधन हैं. उनके नारे, स्लोगन, कथनी - करनी सच के करीब हो सकते हैं. सौ फीसदी सच नहीं होते. मेरा मानना है कि उनकी नियत में-निर्णय में कम या ज्यादा खोट होता ही है. 

6. जातियों का विभिन्न वर्गों में बंटवारा नेताओं ने अपने हिसाब से किए हैं. यह अब भी हो रहा है. आगे भी होगा. रोहिणी आयोग की रिपोर्ट सामने आने दीजिए. देखिएगा कि कैसे अनेक नेताओं की दुकान बंद हो जाएगी. 

7. राजस्थान के दो जिलों के जाट एक खास वर्ग का हिस्सा हैं. शेष जिलों के जाट दूसरे वर्ग- समूह में रखे गए हैं. ऐसी ही स्थिति राजस्थान, गुजरात के राजपूतों की है. भामटा राजपूत, नोनिया राजपूत--- पढिएगा. ऐसी ही स्थिति दूसरी जातियों में भी है. यानी?? झोल है, सब जगह है. 

8. कोई भी रिपोर्ट या नियम - अधिनियम खालिस, सौ फीसदी खरा, टंच नहीं होता. खामियां, दिक्कत रह ही जाती है. इसलिए विरोध जताइए, अतिवादी नहीं होना चाहिए. हर प्रश्न को मरने- जीने का सवाल नहीं बनाना चाहिए. 

9. कुछ जातियों के युवा सामान्य जातियों से बैर दिखाते हैं. यह गलत हैं. वे याद नहीं रखते कि कभी उनकी जाति का वर्ग भी बदल सकता है. झारखंड में भोक्ता SC से ST हो गए ! कुछ युवा राजनीतिक स्लोगन से व्यग्र हो जाते हैं. वे समझ नहीं पाते कि उन्हें व्यग्र करने के लिए ही स्लोगन बनाए जाते हैं. झूठ का मायाजाल गढा और गढवाया जाता है. 

10. भारतीय समाज का कंपोजिशन जिस तरह का है, और AI के इस जमाने में कौन किसको दबा सकता है? खुन्नस या नपुसंक क्रोध अलग बात है. समाज में सब साधु नहीं होते. 

11. जिन जातियों को सामान्य कहा जाता है, उनका कंपोजिशन 30-31 फीसदी है. यह सभी राजनीतिक दल जानते हैं. पर स्लोगन अलग होता है. वैसे, राज्यों के स्तर पर कंपोजिशन अलग - अलग है. वैसे ही OBC जातियों का कंपोजिशन 41-42 फीसदी ही है. इसमें  B1 और B2 कीजिए. फिर राज्य और केंद्र की सूची भी अलग - अलग है. राज्य - राज्य की सूची अलग है. जो जाति दिल्ली में सामान्य है, वही पंजाब - हरियाणा में सामान्य नहीं है. SC  जातियों का कंपोजिशन 16-17 फीसदी है, तो ST जातियों का कंपोजिशन 7-8 फीसदी है. जाति जनगणना में स्थिति और साफ हो जाएगी. 

12. तो वर्ग - जाति से इतर व्यक्ति किसी व्यक्ति को दबा सकता है, यह तो मान्य है. इसके लिए पूरी जमात दोषी हो, मैं कभी नहीं मानता. जिस समाज में कृष्ण थे, कंस भी वहीं था. पर क्या कारण है कि कंस दुष्टता का पर्याय है और कृष्ण ईश्वर?

13. कोई किसी को दबाता है, तो कैसे? बाहुबल, धनबल या छलबल से. गौर कीजिएगा, मुहल्ले का विपन्न आदमी अचानक धनी हो जाए, तो उसके बोल - व्यवहार में फर्क आ जाता है. व्यक्ति नहीं बदला, उसकी जाति या धर्म नहीं बदला, उसका धन उसे बहलाता है. इस अर्थ में सोचिए, तो मालिक- मजदूर का वामपंथी दर्शन अच्छा लगेगा. धनपति शोषक और गरीब शोषित. 

14. पढिए-लिखिए और मस्त रहिए. समय बदलता है, व्यक्ति और समाज भी बदलता है. बदलेगा. आप समय के चक्र को नहीं रोक सकते. आप अतीत में जाएंगे, तो दुखी होंगे. 

15. मोदी को गाली देना भी बेकार है. मुझे नहीं लगता है कि इस निर्णय में मोदी की राय ली गई होगी. 

16. आज की अपुष्ट खबर है कि मोदी सरकार UGC ही खत्म करने जा रही है. अब बोलिए??? 

17. वोट नीति सब जगह है, पता नहीं कहाँ -कहाँ हो? कितना समझेंगे? यहाँ तो राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया पर गिरोह बनाकर, नाम बदल - बदलकर गंध फैला रही है. इस गंध का भी आनंद लीजिये. (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)