रायपुर :  छत्तीसगढ़ के दूरस्थ जनजातीय अंचलों में अब आत्मनिर्भरता की नई कहानियां आकार ले रही हैं। शासन की ग्रामीण आजीविका योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों की पहल ने विशेष पिछड़ी जनजातियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव रखी है। इसी बदलाव की प्रेरक तस्वीर बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ विकासखंड के ग्राम पंचायत कोठली में देखने को मिली, जहां पहाड़ी कोरवा महिला फुलमनिया ने छोटे से किराना व्यवसाय के जरिए न सिर्फ अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी, बल्कि पूरे समुदाय के लिए प्रेरणा का उदाहरण बन गईं।

कभी सीमित संसाधनों और आर्थिक कठिनाइयों के बीच जीवन यापन करने वाली फुलमनिया के सामने परिवार की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी चुनौती था। भविष्य को लेकर चिंता बनी रहती थी, लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार मानने के बजाय आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुना। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत वे गांव के खुशबू स्व-सहायता समूह से जुड़ीं। समूह की बैठकों और प्रशिक्षणों के माध्यम से उन्हें बचत, वित्तीय प्रबंधन और स्वरोजगार की जानकारी मिली, जिसने उनके भीतर आत्मविश्वास जगाया।

समूह से सामुदायिक निवेश कोष के तहत 8 हजार रुपये की सहायता प्राप्त कर फुलमनिया ने अपने घर में छोटा किराना दुकान शुरू किया। गांव में दैनिक उपयोग की सामग्री उपलब्ध होने से ग्रामीणों को भी सुविधा मिलने लगी। मेहनत और लगन से धीरे-धीरे उनका व्यवसाय बढ़ता गया और दुकान गांव की जरूरत बन गई। दुकान से होने वाली आय ने परिवार की आर्थिक स्थिति को मजबूत करना शुरू किया और घर की छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए दूसरों पर निर्भरता कम हो गई।व्यवसाय में बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए फुलमनिया ने बैंक लिंकेज के माध्यम से 40 हजार रुपये का ऋण लेकर दुकान का विस्तार किया। अतिरिक्त सामग्री और ग्राहकों की मांग के अनुरूप सामान उपलब्ध कराने से उनका व्यवसाय और मजबूत हुआ। आज उनका छोटा प्रयास परिवार के लिए स्थायी आजीविका का आधार बन चुका है।

फुलमनिया कहती हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वे अपना खुद का व्यवसाय चला पाएंगी, लेकिन स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आर्थिक सहयोग के साथ आगे बढ़ने का हौसला भी मिला। अब गांव की अन्य महिलाएं भी उनसे प्रेरित होकर समूहों से जुड़ रही हैं और स्वरोजगार अपनाने के लिए आगे आ रही हैं।

प्रदेश में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। स्वयं सहायता समूहों के जरिए ग्रामीण महिलाओं को बचत, बैंक लिंकेज और आजीविका गतिविधियों से जोड़कर आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है।