नवग्रह पीठ भी नहीं सुधार पाई नराेत्तम की गृह दशा....! 

राज- काज दिनेश निगम ‘त्यागी’

मुख्यमंत्री पद तक के दावेदारों में शुमार रहे भाजपा के दिग्गज नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक गृह दशा ठीक नहीं हो पा रही है। अपने चातुर्य और कूटनीति से कई नेताओं को बुरे दौर में धकेलने वाले नरोत्तम के बुरे दिन विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद शुरू हुए थे। हार के बावजूद संगठन और मैदान में उन्होंने अपनी सकि्रयता कम नहीं की। वे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की टोली में गिने जाते हैं लेकिन पुनर्वास नहीं हाे सका। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें न्यू ज्वाइनिंग टोली का मुखिया बनाया गया तो 5 लाख से ज्यादा कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता भाजपा में आ गए। विधानसभा के कई चुनावों में उन्हें भेजा गया, वहां भी वे सफल रहे। इस बीच वे राज्यसभा के दावेदार रहे और प्रदेश अध्यक्ष पद के भी, लेकिन फैसला उनके पक्ष में नहीं हुआ। संभवत: अपनी राजनीतिक गृह दशा को ठीक करने के लिए उन्होंने नवग्रह पीठ की प्राण प्रतिष्ठा कराने का निर्णय लिया। महोत्सव की शुरुआत कलश यात्रा से हुई थी। इसमें भीड़ इतनी बढ़ गई कि अफरा-तफरी मच गई। लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगे, महिलाएं भीड़ के नीचे दब गईं। एक महिला रति साहू की हादसे में मृत्यु हो गई और लगभग एक दर्जन घायल हो गईं। भगदड़ कलश बांटने की खबर से मची क्योंकि भीड़ ज्यादा थी। नरोत्तम ने इसके लिए माफी मांगी है। वहां चल रही कथा के दौरान भी एक महिला की मौत हो गई। हादसे से साफ है कि उनके बुरे दिन अभी खत्म नहीं हुए।

संकट में सीएम से माफी मंगवाने वाले कथावाचक....

बापू आशाराम की तरह एक और कथावाचक श्री पंच अग्नि अखाड़े के महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी उर्फ ईश्वरानन्द पर दुष्कर्म के आरोप लगे हैं। आरोप लगाने वाली युवती राजस्थान की है। उसका आरोप है कि जब वह नाबालिग थी तब से ही उत्तम स्वामी उसके साथ रेप कर रहे हैं। अब किसी तरह शिकायत करने की हिम्मत जुटाई है लेकिन उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं। इसलिए उन्होंने चौबीस घंटे सुरक्षा की मांग की है। उत्तम स्वामी का आश्रम सलकनपुर में है। एक कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव नहीं पहुंचे तो स्वामी जी ने सार्वनजिक तौर पर नाराजगी व्यक्त की थी। उनका रुतबा और असर ऐसा है कि मुख्यमंत्री डॉ यादव को वीडियो कॉल से जुड़ कर माफी मांगना पड़ी थी। उत्तम स्वामी का आश्रम पहले राजस्थान में था लेकिन विवादों में रहने के कारण उन्हें वहां से भाग कर मप्र आना पड़ा था। उनके संघ और भाजपा नेताओं से गहरे संबंध हैं। इसलिए भाजपा और सरकार चुप हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में वे ज्यादा फले-फूले। कांग्रेस नेता केके मिश्रा ने स्वामी पर व्यापम घाेटाले में शामिल होने का भी आरोप लगाया था लेकिन वे बच गए थे। सत्ता की ताकत से गहरे जुड़े स्वामी जी रेप के मामले से कैसे उबरते हैं, यह देखने लायक होगा। फिलहाल तो वे कथा-वथा छोड़ कर भूमिगत हो गए हैं।

मेहनत के बावजूद संगठन नहीं सुधार पा रहे जीतू....

जीतू पटवारी को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का दायित्व संभाले दो साल से ज्यादा हो गए हैं। मैदानी स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की उन्होंने भरपूर कोशिश भी की है। बावजूद इसके वे अब तक संगठन को दुरुस्त नहीं कर पाए। किसी तरह जिलों की कार्यकारिणी गठित हुईं तो बड़ी होने के कारण उन्हें भंग करना पड़ रहा है। अब जिन्हें हटाया जाएगा, उन कार्यकर्ताओं में नाराजगी स्वाभाविक है। गुटबाजी थमी नहीं और इसे लेकर राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे के सामने उन्हें ही घेर लिया गया। साफ है कि सभी नेताओं का ‘अपनी ढपली, अपना राग’ चल रहा है। प्रदेश में संगठन का प्रभारी महामंत्री प्रदेश अध्यक्ष की आंख और कान होता है। इस पद पर हमेशा प्रदेश की राजनीति को समझने और संगठन का लंबा अनुभव रखने वाले वरिष्ठ नेताओं को बैठाया जाता था, लेकिन यह दायित्व संजय कामले जैसे नए चेहरे के पास है, जो बाबू की तरह सिर्फ फाइलों, आदेशों में हस्ताक्षर करने का काम करते हैं। चूंकि उन्हें प्रदेश के विभिन्न जिलों के राजनीतिक हालात और नेताओं के बारे में जानकारी नहीं हैं, इसलिए इससे ज्यादा वे कुछ कर भी नहीं सकते। संगठन की मजबूती के हालात ये हैं कि प्रदेश मुख्यालय में जब कोई बैठक होती है या जीतू खुद होते हैं, तभी नेता दिखते हैं, शेष दिनों में सन्नाटा रहता है। इस तरह कैसे सत्ता में वापसी कर पाएगी कांग्रेस?

राज्यसभा की सीट के लिए कांग्रेस में सिर-फुटौव्वल....

राज्यसभा की खाली होने वाली तीन सीटों में से एक दिग्विजय सिंह की है। उनका कार्यकाल अप्रैल में समाप्त हो जाएगा। राजनीतिक हालात को देखते हुए उन्होंने खुद घोषणा कर रखी है कि इस बार वे राज्यसभा के लिए प्रत्याशी नहीं होंगे। हालांकि यह तय करना कांग्रेस आलाकमान का काम है। ऐसे में कांग्रेस के दावेदारों के बीच सिर-फुटौव्वल के हालात बन गए हैं। सबसे पहले कांग्रेस अजा विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने कहा कि राज्यसभा में इस बार किसी दलित नेता को भेजा जाना चाहिए। इसके बाद अल्पसंख्यक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष शेख अलीम ने अल्पसंख्यक वर्ग को यह सीट देने की मांग कर डाली। उनका कहना है कि 25 सालों से किसी भी अल्पसंख्यक को राज्यसभा नहीं पहुंचाया गया है। इसलिए किसी अल्पसंख्यक को राज्यसभा भेजा जाए। पिछड़ा वर्ग से अरुण यादव और कमलेश्वर पटेल प्रबल दावेदार हैं ही। कमलनाथ, मीनाक्षी नटराजन जैसे नेता सामान्य वर्ग से राज्यसभा जाने की चाहत रखते हैं। लोकसभा का पिछला चुनाव न लड़े पिछड़े वर्ग के अरुण यादव का दावा इस बार मजबूत बताया जा रहा है। इसकी वजह मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव भी हैं। उनके प्रभाव में पूरा यादव समाज भाजपा में न चला जाए, इसलिए भी अरुण का नाम आगे आया है। वे सांसद, केंद्र में मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व निभा चुके हैं। 

भाजपा ने की एक और दिग्गज को घर बैठाने की तैयारी....!

भाजपा के एक दिग्गज गोपाल भार्गव पिछले कुछ समय से चर्चा में हैं। लंबे समय बाद पहले वे भाेपाल स्थित बंगले में बच्चों का अस्पताल बनाने को लेकर चर्चा में आए, जिसका फीता खुद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने पहुंच कर काटा। उन्होंने अन्य विधायकों को भी भार्गव से प्रेरणा लेने की सलाह दी। ऐसा लगा कि भार्गव की संगठन-सरकार से नाराजगी दूर हो रही है। लेकिन इसके बाद आए उनके कई बयान संकेत देते हैं की वे अब भी नाराज हैं क्यों कि उन्हें तवज्जो नहीं मिल रही है। पहले उन्होंने यूजीसी के जरिए ब्राह्मणों की उपेक्षा को आवाज दी थी, अब उन्होंने कह दिया कि दिग्विजय सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब उन्हें कांग्रेस में आने और मंत्री बनाने का ऑफर मिला था लेकिन उन्होंने जवाब दिया कि वे िबकाऊ नहीं, टिकाऊ हैं। सवाल यह है कि इतने साल बाद उन्हें यह किस्सा क्यों सुनाना पड़ा? भार्गव ने यह भी कहा कि  राजनीति में उपेक्षा किसी भी व्यक्ति को अंदर से तोड़ देती है। सरकार नहीं सुनती, तो मन टूट जाता है। अपना पूरा जीवन पार्टी को समर्पित कर दिया है, क्षेत्र में कभी कांग्रेस के पैर नहीं जमने दिए लेकिन लंबी सेवा के बावजूद अपेक्षित सम्मान ना मिलना पीड़ा देता है। साफ है कि संगठन और सरकार में उनकी राय को तवज्जो नहीं दी जा रही है। क्या यह माना जाए कि भाजपा नेतृत्व ने अन्य कई दिग्गजों की तरह इन्हें भी घर बैठाने का मन बना लिया है?