चार साल में चार्जशीट नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को लगाई कड़ी फटकार
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) ने एक आपराधिक मामले की जांच में हो रही अत्यधिक देरी को लेकर महाराष्ट्र सरकार और राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। न्यायालय ने अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि वारदात के चार साल बीत जाने के बाद भी पुलिस अब तक अदालत में चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल नहीं कर पाई है, जो हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली की एक गंभीर और चिंताजनक खामी को उजागर करता है। कोर्ट के न्यायाधीश इस ढुलमुल रवैये से इस कदर नाराज थे कि उन्होंने राज्य सरकार को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि यदि व्यवस्था में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो वे सरकार को बेनकाब करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
अदालत ने सरकार से मांगे तीखे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार से इस असामान्य और अत्यधिक देरी पर स्पष्टीकरण मांगा है। अदालत ने सरकार से लिखित में जवाब देने को कहा है कि:
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जांच को इतने लंबे समय तक लटकाए रखने के पीछे क्या मुख्य कारण थे?
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इस घोर लापरवाही और लेतीफी के लिए कौन-कौन से अधिकारी सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं?
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दोषी और लापरवाह पुलिस अधिकारियों के खिलाफ प्रशासन द्वारा अब तक क्या अनुशासनात्मक या कानूनी कार्रवाई की गई है?
'समय पर जांच' न्याय व्यवस्था की मूल आत्मा
पीठ ने न्याय के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए कहा कि एक निश्चित समय सीमा के भीतर जांच पूरी करना और जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल करना किसी भी निष्पक्ष न्याय व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकता है। अदालत ने जोर देकर कहा कि जांच में अनावश्यक और बेवजह का विलंब न केवल पीड़ित पक्ष के साथ अन्याय है, बल्कि यह आरोपी के कानूनी अधिकारों का भी हनन करता है। न्याय में देरी होने से पूरी कानूनी प्रक्रिया पर से आम जनता का भरोसा उठने लगता है।
विस्तृत प्रगति रिपोर्ट सौंपने का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को आदेश जारी किया है कि वे इस केस की वर्तमान स्थिति और अब तक हुई प्रगति पर एक विस्तृत और व्यापक रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके साथ ही, न्यायालय ने पुलिस प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे इस मामले की जांच में तेजी लाएं और लंबे समय से लंबित पड़ी सभी कानूनी और औपचारिक प्रक्रियाओं को अविलंब पूरा करें।
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