मुस्लिम देशों की बैठक में पाकिस्तान पड़ा अकेला, समर्थन जुटाने में नाकाम
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) यात्रा अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है। पिछले दस वर्षों में दोनों देशों के बीच विकसित हुए प्रगाढ़ संबंधों ने न केवल भारत की विदेशी नीति को नई ऊँचाई दी है, बल्कि मुस्लिम जगत में पाकिस्तान के प्रभाव को भी काफी हद तक सीमित कर दिया है। आज यूएई खाड़ी देशों में भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र बनकर उभरा है, जो ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों को आधुनिक सामरिक साझेदारी में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कूटनीतिक सफलता और पाकिस्तान की बढ़ती दूरियां
भारत की कूटनीतिक कुशलता का ही परिणाम है कि आज यूएई जैसा प्रभावशाली मुस्लिम राष्ट्र हर मंच पर भारत के साथ खड़ा दिखाई देता है। वर्ष 2019 में पाकिस्तान के पुरजोर विरोध को दरकिनार करते हुए यूएई द्वारा भारत को इस्लामिक सहयोग संगठन की बैठक में विशेष अतिथि के रूप में बुलाना एक युगांतकारी घटना थी। इसके विपरीत, पाकिस्तान और यूएई के रिश्तों में कड़वाहट साफ देखी जा सकती है, जहाँ यूएई ने न केवल पाकिस्तानियों के लिए वीजा नियमों को कड़ा किया है, बल्कि बकाया कर्ज की वापसी का दबाव भी बढ़ाया है। दोनों देशों के बीच 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे मौकों पर दिखा आपसी सहयोग यह स्पष्ट करता है कि अब यह रिश्ता केवल औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है।
ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक लक्ष्यों का नया रोडमैप
प्रधानमंत्री की इस यात्रा के केंद्र में भारत की ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों को सुरक्षित करना सबसे ऊपर है। एचपीसीएल के साथ हुए महत्वपूर्ण एलएनजी समझौते के तहत आपूर्ति को निर्धारित समय 2028 से पहले शुरू करने पर गहन चर्चा होने की उम्मीद है। साल 2022 में हुए मुक्त व्यापार समझौते ने दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को नई ऊर्जा दी है, जिससे द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। अब दोनों देशों ने मिलकर वर्ष 2032 तक इस व्यापारिक आंकड़े को 200 अरब डॉलर तक ले जाने का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, जो आने वाले समय में दोनों अर्थव्यवस्थाओं की परस्पर निर्भरता को और बढ़ाएगा।
चार स्तंभों पर टिकी भविष्य की रणनीतिक साझेदारी
भारत और यूएई के बीच इस मज़बूत रिश्ते की नींव कूटनीति, व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वहां रह रहे 45 लाख भारतीय प्रवासियों पर टिकी है। ये प्रवासी भारतीय न केवल यूएई की विकास गाथा का अहम हिस्सा हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच एक जीवंत सांस्कृतिक सेतु का कार्य भी कर रहे हैं। वर्तमान में यह सहयोग पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर अब अंतरिक्ष अनुसंधान, हरित ऊर्जा, परमाणु शक्ति और उन्नत रक्षा तकनीकों तक पहुँच चुका है। यह रणनीतिक विस्तार इस बात का प्रमाण है कि भारत ने अपनी दूरदर्शी नीति के जरिए खाड़ी क्षेत्र में अपनी स्थिति को अत्यंत सुदृढ़ और निर्णायक बना लिया है।
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