जबलपुर के इस गांव में LPG के लिए ‘नो टेंशन’, हर घर में जल रहे गैस स्टोव नई तकनीक से
जबलपुर। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के असर के चलते देश के कई हिस्सों में एलपीजी गैस सिलेंडर की किल्लत को लेकर लोग परेशान हैं. वहीं, जबलपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर बरगी विधानसभा की ग्राम पंचायत बन्दरकोला रसोई गैस के इस संकट के बीच आत्मनिर्भरता की मिसाल बनकर सामने आई है. यहां के ग्रामीणों को एलपीजी गैस की कमी से कोई खास फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि उनके घरों में गोबर गैस प्लांट लगे हुए हैं, जिनसे सालों से रोजाना खाना पकाया जा रहा है. कई घर तो ऐसे नही हैं जिनके पास गैस सिलेंडर है ही नहीं. 4 सदस्यों का घर हो या 20 सदस्यों का सभी का खाना रोजाना ही गोबर गैस से तैयार होता है।
गांव के 50 फीसदी घरों में बायोगैस प्लांट
दरअसल, बरगी विधानसभा क्षेत्र के बन्दरकोला पंचायत में 50 प्रतिशत घरों में बायोगैस प्लांट स्थापित हैं. करीब 300 घरों की इस ग्राम पंचायत में आधे से ज्यादा घर पिछले कई सालों से गोबर गैस का ही इस्तेमाल करते आ रहे हैं. ग्रामीण अपने पशुओं के गोबर से गैस तैयार करते हैं और उसी गैस से चूल्हा जलाकर भोजन बनाते हैं. इससे न तो सिलेंडर की चिंता रहती है और न ही महंगे ईंधन का खर्च उठाना पड़ता है. आज हालात यह हैं कि जब अन्य जगहों पर गैस सिलेंडर की कमी की खबरें सामने आती हैं, तब भी बन्दरकोला गांव के घरों में चूल्हे बिना किसी परेशानी के जल रहे हैं. यही वजह है कि यह गांव आत्मनिर्भर ऊर्जा मॉडल के रूप में उभर रहा है।
एलीपी गैस सिलेंडर के लिए नो टेंशन
इस गांव की हकीकत जनाने पहुंचा. हमने शुरू की गांव के ही अजय पटेल के घर हैं. अजय पटेल के घर में पिछले 20 सालों से गोबर गैस प्लांट का इस्तेमाल किया जा रहा है. घर में तकरीबन 6 गए हैं, जिसे निकालने वाले गोबर के जरिए गोबर गैस तैयार की जाती है अजय पटेल बताते हैं कि जब से उन्होंने गोबर गैस का इस्तेमाल करना शुरू किया है उन्होंने एलपीजी गैस सिलेंडर को भरवा नहीं बंद कर दिया है अब घर में रोजाना 15 से 18 लोगों का खाना बनता है और कभी भी उन्हें रसोई गैस की किल्लत नहीं होती है. साथ ही गायों की सेवा भी हो जाती है और फिर फसलों के लिए खाद भी मिल जाती है। अजय पटेल के परिवार की महिलाएं भी बायोगैस इस्तेमाल करने से बेहद खुश हैं वह कहती है कि उन्हें कभी एलपीजी गैस सिलेंडर की जरूरत ही नहीं पड़ती है. दोनों टाइम बायोगैस से ही घर का खाना बनता है और उन्हें कभी भी तरह की परेशानी नहीं. इसमें न तो कोई अतिरिक्त खर्च होता है और न ही गैस खत्म होने की चिंता रहती है।
दो गाय वाले परिवार में भी बायोगैस प्लांट
वहीं, गृहणी बसंती पटेल का कहना है कि गोबर गैस से उन्हें बहुत फायदा हुआ हैं. जब से गोबर गैस का इस्तेमाल शुरू किया हैं. गैस सिलेंडर भरवाना ही बंद कर दिया. एलपीजी सिलेंडर खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ती. यही स्थिति गांव के अन्य घरों की भी है. हमारी टीम में अलग-अलग घरों में जाकर लोगों से जब बातचीत की तो उनका कहना था कि एक दो गाय पालने वाला परिवार भी बायोगैस प्लांट को संचालित कर रहा है. जिसकी वजह से गांव में एलपीजी गैस सिलेंडर की अधिकांश परिवारों को कोई जरूरत नहीं है। देश में गोबर गैस को लेकर पिछले कई दशकों से चर्चाएं चलती हैं लेकिन लोगों ने इसको अपनाना बंद कर दिया है. आज जब रसोई गैस की किल्लत शुरू हो चुकी है तो ऐसे में गोबर गैस को लेकर बंदरकोल गांव की आत्मनिर्भरता बताती है कि अगर परंपरागत और आसानी से मिलने वाली चीजों का इस्तेमाल किया जाए तो आधुनिक ऊर्जा पर आत्मनिर्भरता को कम किया जा सकता है।
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