श्राद्ध से तर्पण तक, तिल के बिना क्यों अधूरा माना जाता है हिंदू धर्म का हर शुभ कार्य
तिल को हमारी हिंदू संस्कृति और धर्म में पवित्र स्थान प्राप्त है. हिंदू धर्म में हवन, दान और पितृ कर्म में इसका उपयोग अनिवार्य माना गया है. मकर संक्रांति, अमावस्या और पितृ पक्ष जैसे विशेष अवसरों पर तिल का महत्व और भी बढ़ जाता है. शास्त्रों के अनुसार तिल का दान न केवल पापों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि यह जीवन में शुभता और सुख-समृद्धि का संचार भी करता है.
पंडित राजेंद्र जोशी बताते हैं कि गरुड़ पुराण में तिल की उत्पत्ति का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का वध करने के लिए वराह अवतार धारण किया, तब वे अत्यंत क्रोधित हुए. उस समय उनके दिव्य शरीर से जो पसीना निकला, वही धरती पर तिल के रूप में प्रकट हुआ. चूंकि इसकी उत्पत्ति स्वयं भगवान के शरीर से हुई है, इसलिए इसे दिव्य और पवित्र माना जाता है. भगवान का यह क्रोध भी सृष्टि के कल्याण और अधर्म के नाश के लिए था.
क्रोध पर नियंत्रण की अनमोल सीख
पंडित राजेंद्र जोशी का कहना है कि भगवान का क्रोध हमेशा धर्म की रक्षा के लिए होता है, लेकिन मनुष्य का क्रोध उसकी बुद्धि को नष्ट कर देता है. इस कथा से हमें यह संदेश मिलता है कि हमें अपने क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए. जिस तरह भगवान के क्रोध से भी ‘तिल’ जैसी कल्याणकारी वस्तु का जन्म हुआ, वैसे ही मनुष्य को अपनी ऊर्जा का उपयोग सृजनात्मक कार्यों में करना चाहिए न कि विनाश में.
पितृ शांति और श्राद्ध कर्म में तिल की महत्त्वता
श्राद्ध और पितृ कर्म में तिल के बिना तर्पण संभव नहीं माना जाता. ऐसी मान्यता है कि तिल और जल मिलाकर अर्पित करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे प्रसन्न होकर वंशजों को आशीर्वाद देते हैं. पूर्वजों की संतुष्टि और घर में सुख-शांति बनाए रखने के लिए हर शुभ कार्य में तिल का उपयोग करने की परंपरा युगों से चली आ रही है.
स्वास्थ्य का खजाना भी है तिल
धार्मिक महत्व के अलावा तिल पोषण का भी भंडार है. इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन और फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है. सर्दियों के मौसम में तिल का सेवन शरीर को अंदर से गर्म रखता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है. तिल का तेल मालिश के लिए भी श्रेष्ठ माना गया है, जो त्वचा को पोषण देने के साथ-साथ हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है.
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