7वीं शताब्दी के इस मंदिर में बिना घंटी बजाए अधूरी मानी जाती है भगवान शिव की पूजा, यहां है 10 फीट ऊंचा शिवलिंग
तमिलनाडु के कांचीपुरम को मंदिरों का शहर माना जाता है और इस शहर को दक्षिण भारत का काशी और मथुरा भी कहा जाता है. पवित्र जगहों में शामिल कांचीपुरम में बहुत सारे मंदिर हैं, लेकिन कैलाशनाथर मंदिर सबसे पुराना और प्रसिद्ध है, इसे कैलाशनाथ मंदिर भी कहा जाता है. मंदिर को शिल्पकारी और उसकी वास्तुकला के लिए जाना जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर के दर्शन करने मात्र से ही सभी इच्छाएं पूरी हो जाती है और रोग व शोक दूर हो जाते हैं. बताया जाता है कि इस मंदिर को छोटे-छोटे पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है. आइए जानते हैं इस मंदिर की खास बातें…
कैलाशनाथर मंदिर भगवान शिव को समर्पित मंदिर है जिसके प्रांगण में 58 छोटे-छोटे अन्य मंदिरों का निर्माण किया गया है. मंदिर में ग्रेनाइट का 10 फीट ऊंचा शिवलिंग है. इसके अलावा भगवान विष्णु, देवी, सूर्य, गणेश जी और कार्तिकेय के मंदिर भी देखने को मिल जाएंगे. माना जाता है कि इस मंदिर में बिना घंटी बजाए भगवान शिव की पूजा अधूरी मानी जाती है. घंटी भगवान और अपने अंदर के चेतना को जागृत करने के लिए बजाई जाती है.
मंदिर को लेकर कोई पौराणिक कथा मौजूद नहीं है, लेकिन मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है. मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी ईस्वी में पल्लव राजा राजसिंह ने कराया था और महेंद्र वर्मा पल्लव ने मंदिर के निर्माण को पूरा करवाया था. कैलाशनाथर मंदिर वेदवती नदी के तट पर बना है, जिससे इसकी अलौकिकता और बढ़ जाती है. मंदिर में शिवरात्रि के मौके पर विशेष पूजा अनुष्ठान होता है और भारी संख्या में भक्त मंदिर में दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं.
मंदिर के निर्माण और उसकी वास्तुकला में पल्लव राजवंश की झलक दिखती है. मंदिर की नींव ग्रेनाइट पत्थर पर रखी गई है और मंदिर को बनाने में बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया. मंदिर की दीवारों और मुख्य द्वार पर ज्यादातर सिंह की प्रतिमा लगी है. पल्लव राजवंश का प्रतीक सिंह हुआ करता था. इसके अलावा दीवारों पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनी हैं, जो अलग-अलग संस्कृति को दिखाती हैं.
मंदिर का रखरखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है, लेकिन आज भी मंदिर जर्जर हालत में है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का मानना है कि इस मंदिर का बनाव ही इसे बाकी मंदिरों से अलग बनाता है, क्योंकि इस मंदिर को छोटे-छोटे पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है. मंदिर को बनाने में किसी बड़े पत्थर का इस्तेमाल नहीं किया गया है. मंदिर को अध्यात्म के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से देखा जाता है. पर्यटक सुबह 6:30 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक और शाम 4:00 बजे से 7:30 बजे मंदिर में दर्शन के लिए आ सकते हैं.
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