कांग्रेस का राष्ट्रीय अभियान मप्र से शुरू करने के मायने
कांग्रेस का राष्ट्रीय अभियान मप्र से शुरू करने के मायने
राज-काज
दिनेश निगम ‘त्यागी
अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ समूची कांग्रेस केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर हमलावर है। इसे लेकर वह राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने जा रही है। पर इसे शुरू करने के लिए मप्र का चुनाव अचंभित करने वाला है। सवाल उठ रहा है कि जब प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में नहीं हैं, मप्र विधानसभा चुनाव नजदीक नहीं है, प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी थमने का नाम नहीं ले रही। अंतर्कलह के चलते विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे ने इस्तीफा दे दिया है। बावजूद इसके पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी 24 फरवरी को अभियान को शुरू करने मप्र आ रहे हैं। यहां वे एक बड़ी रैली को संबोधित करेंगे। मप्र से अभियान शुरू करने की एक वजह यह हो सकती है कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान यहां से हैं। कांग्रेस ट्रेड डील में किसानों के हित अमेरिका के पास गिरवी रखने का आरोप लगा रही है। शिवराज इस मसले पर सरकार का पक्ष रख कर कांग्रेस को घेर रहे हैं। दूसरा, संभव है कि यहां बड़ी रैली कर पार्टी नेतृत्व गुटबाजी से जूझ रही प्रदेश कांग्रेस में जोश भरना चाह रही हो। तीसरा, रैली में यदि जीतू पटवारी अच्छी भीड़ जुटाने में सफल रहे तो उनके राज्यसभा जाने का रास्ता भी खुल सकता है। बता दें, अप्रैल में दिग्विजय सिंह की राज्यसभा सीट खाली हो रही है।
किसी के गले नहीं उतरी हेमंत के इस्तीफे की वजह!
विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे का पद से इस्तीफा चौंकाने वाला है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को अचानक भेजे इस्तीफे में उन्होंने जो वजह बताई है, वह किसी के भी गले नहीं उतर रही। इससे पता चलता है कि विधानसभा के अंदर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और हेमंत के बीच भी समन्वय नहीं है। हेमंत ने लिखा है कि परिवार और क्षेत्र की जनता को पर्याप्त समय नहीं दे पाने के कारण वे यह जिम्मेदारी छोड़ रहे हैं। यह तर्क गले इसलिए नहीं उतर रहा क्योंकि उपनेता प्रतिपक्ष का पद इतनी व्यस्तता वाला नहीं है कि परिवार और जनता को समय न दे पाने का सवाल पैदा हो। वैसे भी विधानसभा के सत्र अब ज्यादा दिन नहीं चलते। इसलिए परिवार को समय न देने की बात आती तो विधायकी छोड़ते। साफ है कि वजह कुछ और है। एक वाकया इस्तीफे के दिन सदन के अंदर घटित हुआ। इंदौर में दूषित पानी के स्थगन पर ग्राह्यता पर चर्चा के दौरान हेमंत पांईट ऑफ आर्डर पर बोलना चाह रहे थे। स्पीकर ने कह दिया कि मैंने नेता प्रतिपक्ष को बोलने के लिए कह दिया है। हेमंत ने सिंघार से बोलने की अनुमति मांगी लेकिन उन्होंने तवज्जो नहीं दी। इससे पहले सिंघार की अनुपस्थिति में हेमंत ने स्थगन प्रस्ताव के लिए 16 सदस्यों के नाम दे दिए थे। इस पर भी विवाद हुआ था। संभवत: हेमंत ने खुद को अपमानित समझा और अचानक इस्तीफे का निर्णय ले लिया।
कांग्रेस की ऐसी भाषा देती है भाजपा को संजीवनी !
विधायक फूल सिंह बरैया जब बसपा में थे तब सवर्णों के खिलाफ आग उगलते थे, अपना दल बनाया तब भी अपनी भाषा नहीं बदली और अब जब कांग्रेस में हैं तब भी बसपा वाली शैली से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। फूल सिंह जो बोलते हैं उससे भाजपा और संघ परिवार को संजीवनी मिलती है। यह सच है कि कांग्रेस सहित देश में एक वर्ग हिंदू राष्ट्र के पक्ष में नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात में हिंदू समाज का बहुमत ऐसा चाहता है। संघ परिवार और धीरेंद्रकृष्ण शास्त्री सहित कुछ कथावाचक हिंदू राष्ट्र को लेकर मुखर हैं। इन्हें अच्छा समर्थन भी मिल रहा है। कांग्रेस नेतृत्व इस मसले पर कुछ बोलने की बजाय चुप है, लेकिन फूल सिंह ने अपने ही अंदाज में इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर हिंदू राष्ट्र बना तो महिलाएं बर्बाद हो जाएंगी। हिंदू राष्ट्र नहीं होना चाहिए। हिंदू राष्ट्र बनेगा तो हम मरेंगे। शिक्षा बंद हो जाएगी, सब खत्म हो जाएगा। अभी इस राष्ट्र में क्या कमी है? वर्तमान राष्ट्र बेहतर है। मैं हमेशा सच बोलता हूं फिर भी अगर मेरा बयान गलत है तो एफआईआर कराइए। इस पर उच्च शिक्षा मंत्री मंत्री इंदर सिंह परमार भड़क उठे। उन्होंने कहा कि जो लोग हिंदू जीवन दर्शन को नहीं समझते, वह ऐसा विचार रखते हैं। वैदिक काल में महिलाओं को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। वसुधैव कुटुंबकम हिंदू जीवन दर्शन का एकमात्र हिस्सा है।
ऐसी मर्यादा टूटी कि अखाड़े में तब्दील हो गया सदन
विधानसभा के जो सदस्य हमेशा सदन की गरिमा और परंपराओं की दुहाई देते हैं, वे ही उसे तार-तार करने पर आमादा हो जाएं तो कष्ट होता है। बजट सत्र के दौरान एक दिन कुछ ऐसा ही हुआ, ऐसी मर्यादा टूटी कि सदन अखाड़े में तब्दील नजर आया। तू-तड़ाक के बाद बात गुंडों की तरह एक दूसरे की औकात पर आ गई। सत्तापक्ष और विपक्ष के सदस्य ऐसे हमलावर थे, जैसे दो गैंगों के बीच आमने-सामने भिड़ंत हो रही हो। आसंदी पर बैठे स्पीकर भी असहाय थे। भला हो मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव का, जिन्होंने सदन का नेता होने के नाते बड़प्पन दिखाया और सत्तापक्ष की ओर से कहे गए शब्दों के लिए माफी मांगी। बाद में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को औकात दिखाने वाले संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी गलती मानते हुए खेद व्यक्त किया। स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि सदन के संचालन के लिए नियम और परंपरा का पालन जरूरी है। आज दुर्भाग्य से असहज स्थिति बन गई है। विधानसभा की गौरवशाली परंपरा रही है, सदन का गौरव लगातार बढ़ता रहे, इस बात का प्रयत्न सभी को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा कहते थे कि बात करते समय गुस्सा दिखना चाहिए, लेकिन आना नहीं चाहिए। लेकिन आज दोनों पक्षों को गुस्सा आ गया है, यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं।
दूषित पानी से मौतों पर चर्चा से भागना कितना उचित
इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से मौतों की संख्या पर मतभेद हो सकता है। सरकारी पक्ष यह संख्या 22 बता रहा है जबकि विपक्ष और मीडिया 35। मृत्यु 22 की हुई हो या 35 की, लेकिन यह ज्वलंत प्रश्न है कि सरकार और नगर निगम लोगों को स्वच्छ, शुद्ध पानी नहीं उपलब्ध करा सके। इतनी मौतों के बावजूद अब भी काफी लोग बीमार हैं तो कुछ अस्पताल में भर्ती। प्रदेश में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर विधानसभा में चर्चा के लिए इससे ज्यादा महत्वपूर्ण विषय और क्या हो सकता है? प्रश्नकाल और बजट पर चर्चा रोक कर भी यदि इस पर चर्चा करा दी जाए तो गलत नहीं होता। इसके लिए सरकार की आलोचना वैसे ही हो रही है, यदि सदन के अंदर भी वह इसे सुन लेती तो पहाड़ नहीं टूट पड़ता। संभव है कि चर्चा से कुछ ऐसा हासिल होता कि भविष्य में ऐसा हादसा न होने के लिए कोई रास्ता निकलता। पर ऐसा नहीं हो सका। सत्तापक्ष इस मुद्दे पर चर्चा से भागता नजर आया और विपक्ष हंगामा करता रहा। स्थगन प्रस्ताव की ग्राह्यता पर चर्चा के प्रारंभ में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सच कहा कि पीड़ित परिवारों से जाकर पूछा जाए कि वे इस विषय पर चर्चा चाहते हैं या नहीं। उन्होंने अपने परिवार के सदस्य सरकार की लापरवाही के कारण ही खोए हैं। साफ है कि सरकार ने चर्चा से भाग कर अच्छा नहीं किया। यदि वह इसे स्वीकार करती तो लोकतंत्र ही मजबूत होता।
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